सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक एकता के एक शानदार उदाहरण के रूप में असम की बंगाली भाषी बराक घाटी दुर्गा पूजा के भव्य उत्सव में पूरी तरह डूब गई है। 1874 तक अविभाजित बंगाल का हिस्सा रहे असम के इस दक्षिणी क्षेत्र – जिसमें कछार, श्रीभूमि (करीमगंज) और हैलाकांडी में आज भी बंगाली विरासत से जुड़ी पुरानी परंपराएं, कलात्मक भव्यता और गहरी भाषाई आत्मीयता देखने को मिलती है।
पूरी घाटी में सड़कें और रास्ते रंग-बिरंगी रोशनी और विशेष थीम पर आधारित भव्य पंडालों से सज गए हैं। सिलचर में बिलपार मिताली संघ, देवलीना क्लब, पब्लिक स्कूल रोड, तारापुर राइस मिल पूजा और बिलपार अपनाजन क्लब जैसी प्रमुख सामुदायिक पूजाओं से लेकर, उदरबंद की कचाकांती कालीबाड़ी और रामकृष्ण मिशन जैसे ऐतिहासिक केंद्रों तक लाखों लोग देवी दुर्गा का आशीर्वाद लेने के लिए पंडालों में आ रहे हैं।
धार्मिक महत्व के अतिरिक्त बराक घाटी में दुर्गा पूजा विभिन्न धर्मों के बीच आपसी सद्भाव के एक अनूठे प्रतीक के रूप में भी जानी जाती है। संस्कृतियों के इस खूबसूरत मिलन में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग पूरे उत्साह के साथ एक-दूसरे का हाथ थामकर उत्सव मनाते हैं।
पंडालों की बारीक कलाकारी और सजावट में मुस्लिम कारीगरों का योगदान हो, या भीड़ को संभालने और आने वाले लोगों का स्वागत करने में स्थानीय स्वयंसेवकों की मदद-यह त्योहार धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठकर पूरी घाटी के लिए एक साझा सामाजिक-सांस्कृतिक उत्सव बन गया है।
स्थानीय प्रशासन द्वारा पुख्ता इंतजाम और सुरक्षा के कड़े नियमों के साथ-साथ वाहनों की आवाजाही पर नियंत्रण रखने से, यह त्योहार जीवन के हर क्षेत्र से जुड़े लोगों को एक साथ ले आया है। पूरी घाटी में लोग शांति, कला और आपसी सद्भाव के साथ इस उत्सव का आनंद ले रहे हैं।
वहीं, त्रिपुरा में दुर्गा पूजा का उत्सव पूरे उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। राज्यभर में श्रद्धालु और पर्यटक मां दुर्गा के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पंडालों में पहुंच रहे हैं। महा सप्तमी दो दिनों तक मनाए जाने के कारण उत्सव की रौनक और बढ़ गई है। यह पर्व राज्यभर में खुशियों, सामुदायिक सद्भाव और आपसी एकजुटता की भावना को बढ़ावा दे रहा है।
ओडिशा में दुर्गा पूजा पूरे धार्मिक उत्साह और पारंपरिक उमंग के साथ मनाई जा रही है। पंडाल और मंदिर की भव्य सजावट श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रहे हैं। शक्ति पीठों पर विशेष अनुष्ठान किए जा रहे हैं, वहीं भुवनेश्वर और कटक सहित प्रमुख शहरों में उत्सवपूर्ण आयोजन और भव्य सजावट देखने को मिल रही है। ये उत्सव ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और देवी दुर्गा के शाश्वत महत्व को दर्शाते हैं, जो दिव्य शक्ति और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक हैं।