मई 21, 2026 3:41 अपराह्न

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सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने निवेशकों से कथित ठगी के मामले में लंबित 53 प्राथमिकियों को एक साथ मिलाने की याचिका पर सुनवाई से किया इनकार

 
 
सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने आज उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया जिसमें यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि निवेशकों से कथित तौर पर 49 करोड़ रुपये की ठगी के मामले में सात राज्यों में लंबित 53 प्राथमिकियों को एक साथ मिला दिया जाए। न्‍यायालय ने टिप्पणी की कि प्राथमिकियों को एक साथ मिलाने और त्वरित सुनवाई के नाम पर, पीड़ित-केंद्रित न्यायिक दृष्टिकोण अपनाने के बजाय, आरोपी के पक्ष में फैसले दिए जा रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश न्‍यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायाधीश जॉयमाल्य बागची तथा विपुल एम. पंचोली की पीठ ने आरोपी उपेंद्र नाथ मिश्र और काली प्रसाद मिश्र की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी की दलीलों से सहमति नहीं जताई। इसके बाद याचिका वापस ले ली गई।
 
आरोपियों के खिलाफ ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा और आंध्र प्रदेश में कई आपराधिक मामले लंबित हैं। सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा जिन बड़े धोखाधड़ी मामलों में प्राथमिकियों को एक साथ मिलाने के दिए गए आदेश वाले पिछले फैसलों का हवाला देते हुए, पीठ ने सवाल किया कि ऐसे अपराधों के पीड़ितों के अधिकारों का क्या होगा? इसके साथ ही पीठ ने प्राथमिकियों को एक साथ मिलाने का आदेश देने से इनकार कर दिया।
 
मुख्‍य न्‍यायाधीश ने आपराधिक कानून में हाल ही में हुए संशोधनों का उल्लेख करते हुए कहा कि अब पीड़ितों के अधिकारों को मान्यता दी गई है।
 
पीठ ने कहा कि धोखाधड़ी का हर मामला अपने आप में अलग और विशिष्ट होता है, क्योंकि इसमें पीड़ित और ठगी की गई राशि अलग-अलग होती है; हालांकि, आरोपी निश्चित रूप से वही रहता है।
 
पीठ ने कहा कि जांच के उद्देश्य से प्राथमिकियों को एक साथ नहीं मिलाया जा सकता। पीठ ने  कहा कि धोखाधड़ी के ऐसे पीड़ित न्यायिक प्रणाली के भी ‘अदृश्य पीड़ित’ होते हैं, क्योंकि न्यायिक प्रणाली ने उनके बारे में विचार नहीं किया। न्यायाधीश बागची ने कहा कि धोखाधड़ी, छल और षड्यंत्र का हर अपराध अपने आप में अलग और विशिष्ट होता है। उन्होंने सवाल किया कि ऐसे अपराधों के पीड़ितों को क्यों कष्ट उठाना चाहिए।