भारत के मुख्य न्यायाधीश ने आज कहा कि न्याय को अधिक सुलभ, पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाना चाहिए। साथ ही, न्याय प्रक्रिया में संवैधानिक मूल्यों और मानवीय पहलू की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।
उज़्बेकिस्तान के समरकंद में एशियाई संवैधानिक न्यायालयों और समकक्ष संस्थानों के संघ के सातवें सम्मेलन के उद्घाटन सत्र और पूर्ण अधिवेशन को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह सम्मेलन एशियाई संवैधानिक न्यायालयों को अपने अनुभव साझा करने और प्रौद्योगिकी के साझा भविष्य के अनुरूप सिद्धांत विकसित करने का महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है।
उन्होंने कहा कि डिजिटलीकरण से अदालतों तक पहुंच बेहतर हो सकती है, मामलों के निपटारे में देरी कम हो सकती है और प्रक्रियाएं सरल बन सकती हैं। वहीं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता न्यायाधीशों और न्यायालय के कर्मचारियों को शोध तथा बड़ी मात्रा में सूचनाओं से निपटने में मदद कर सकती है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संवैधानिक न्यायालयों को गरिमा, समानता, स्वतंत्रता और निष्पक्षता के सिद्धांतों पर कायम रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि चुनौती परंपरा और प्रौद्योगिकी में से किसी एक को चुनने की नहीं, बल्कि संविधान को मार्गदर्शक रखते हुए न्यायिक संस्थानों में प्रौद्योगिकी का सर्वोत्तम उपयोग करने की है।
न्याय व्यवस्था के डिजिटलीकरण के विषय पर बोलते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उच्चतम न्यायालय का दृष्टिकोण तीन संवैधानिक प्रावधानों पर आधारित है। इनमें अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता, अनुच्छेद 14 के तहत कानून के समक्ष समानता और अनुच्छेद 32 तथा अनुच्छेद 39-ए के तहत न्याय तक पहुंच और निःशुल्क कानूनी सहायता शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि डिजिटलीकरण को केवल कंप्यूटरीकरण के रूप में नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रियाओं को नागरिकों की जरूरतों के अनुरूप बेहतर बनाने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
मुख्य न्यायाधीश ने वर्ष 2011 में शुरू की गई ई-कोर्ट्स मिशन मोड परियोजना का भी उल्लेख किया। इसके तहत ई-फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई, डिजिटल केस प्रबंधन और सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग से न्याय तक लोगों की पहुंच बढ़ी है। कोविड महामारी के दौरान मार्च 2020 से जून 2024 के बीच अकेले उच्चतम न्यायालय ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सात लाख पचास हजार से अधिक सुनवाई की।