अक्टूबर 27, 2026 8:46 पूर्वाह्न

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चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया, SIR के तहत फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया

निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण-एसआईआर को कानूनी रूप से अधिकृत बताते हुए सर्वोच्‍च न्‍यायालय में इसका बचाव किया है। आयोग ने कहा है कि इस प्रक्रिया से जुड़े आदेशों को आयोग के तीनों सदस्यों ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी थी।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ याचिका पर दाखिल 248 पन्‍नों के जवाब में आयोग ने ‘फॉर्म 6 में बदलाव किए जाने के आरोपों को खारिज किया। आयोग ने कहा कि मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले वैधानिक ‘फॉर्म 6’ में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली एक पीठ आज मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और एसआईआर के दौरान निर्वाचन आयोग द्वारा लिए गए फैसलों के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई करेगी।

अपने जवाबी हलफनामे में, निर्वाचन आयोग ने इन याचिकाओं को तुरंत खारिज करने की मांग की। आयोग ने इन आरोपों को गलतफहमी पर आधारित बताया और कहा कि ये केवल एक अखबार की रिपोर्ट पर टिके हैं।

आयोग की ओर से उप चुनाव आयुक्त भानु प्रकाश येतुरु द्वारा दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि चुनाव आयोग पर सवाल उठाना दुर्भाग्यपूर्ण है।

इसमें बताया गया है कि इस हलफनामे को भी आयोग के तीनों सदस्यों ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी थी।

हलफनामे में कहा गया है कि एआईआर से जुड़े तीनों आदेश, चुनाव आयोग के सर्वसम्मति से लिए गए फैसलों के आधार पर जारी किए गए थे। ये फैसले भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 का पूरी तरह पालन करते हुए लिए गए थे।

चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी फाइल पर काम चलने के दौरान, यदि कोई आयुक्त कोई सुझाव, टिप्पणी या सवाल रखता है, तो उसे आयोग का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।

‘फॉर्म 6’ विवाद पर, चुनाव आयोग ने साफ तौर पर कहा कि वह इस भ्रामक दावे को पूरी तरह खारिज करता है कि कानूनी फॉर्म में कोई बदलाव किया गया है। इसमें आगे कहा गया है कि फॉर्म 6 एक ऐसा आवेदन है जिसके माध्‍यम से कोई पात्र व्यक्ति मतदाता सूची में अपना नाम शामिल करने की मांग करता है।

हलफनामे के अनुसार, एसआईआर के दौरान संलग्न किया गया घोषणा-पत्र, एसआईआर आदेशों के तहत दिया गया एक अलग दस्तावेज़ है और “यह फॉर्म 6 का हिस्सा नहीं है।”

इसमें कहा गया है कि बिहार एसआईआर में इस्तेमाल किए गए घोषणा-पत्र को बाद के आदेशों में बदल दिया गया था, ताकि आवेदक 2002-03 की मतदाता सूची से अपने, अपने माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी के विवरण दे सकें। इससे एक बार सफलतापूर्वक मैपिंग हो जाने के बाद उन्हें और दस्तावेज़ जमा करने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

निर्वाचन आयोग ने कहा कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में मतदाताओं को शामिल करने के आदेशों के खिलाफ जो अपीलें दायर की गईं, वे राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के अधिकारियों द्वारा दायर की गई थीं। ये अधिकारी सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुरूप वैधानिक प्राधिकरण के रूप में काम कर रहे थे, और “ये मामले आयोग के सामने नहीं लाए गए थे।”

याचिकाओं की स्वीकार्यता पर सवाल उठाते हुए, आयोग ने कहा कि कानून की नज़र में, किसी अख़बार की रिपोर्ट को उसमें बताई गई बातों का सबूत नहीं माना जा सकता।

आयोग ने आगे कहा कि उसने “किसी भी समाचार एजेंसी को कोई आंतरिक नोट या फ़ाइल न तो जारी की है और न ही जारी करने के लिए अधिकृत किया है।”