उच्चतम न्यायालय ने आज आर्द्रभूमि – संरक्षण और प्रबंधन नियम, 2017 के अंतर्गत आर्द्रभूमि की परिभाषा की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की। न्यायालय ने याचिका पर संज्ञान लेते हुए केवल नियम 2(जी) में निहित परिभाषा की कथित अस्पष्टता के मुद्दे पर ही विचार किया।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत दायर याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि 2017 के नियमों ने परिभाषा को संकुचित करके आर्द्रभूमि को उपलब्ध संरक्षण को काफी हद तक कमजोर कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप कई पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील स्थल नियामक सुरक्षा उपायों से बाहर हो गए हैं। उन्होंने कहा कि नियमों के अंतर्गत परिभाषा को कमजोर कर दिया गया है, और 99 में से 44 स्थल तत्काल संरक्षण से बाहर हो गए हैं।
श्री शंकरनारायणन ने कहा कि इसका प्रभाव चिन्हित स्थलों से कहीं अधिक व्यापक है और इसने देश भर की आर्द्रभूमियों को प्रभावित किया है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि 2017 के नियमों के तहत दी गई परिभाषा, उच्चतम न्यायालय के दो पूर्व निर्णयों से विरोधाभास रखती है। ये निर्णय जो अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मानकों के अनुरूप 2010 की व्यापक परिभाषा पर आधारित थे।