उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने युवाओं में पढ़ने की आदत कम होने पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि जो समाज किताबें पढ़ना छोड़ देता है, वह धीरे-धीरे अपनी आलोचनात्मक चिंतन क्षमता खो देता है।
उपराष्ट्रपति ने नई दिल्ली स्थित उपराष्ट्रपति भवन में पी.पी. सत्यन द्वारा लिखित पुस्तक ‘द लाइब्रेरी मैन ऑफ इंडिया: द स्टोरी ऑफ पी.एन. पणिक्कर’ का विमोचन किया। इस अवसर पर उन्होंने नालंदा और तक्षशिला जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों का स्मरण करते हुए युवाओं में पठन-पाठन की संस्कृति को पुनर्जीवित करने का आह्वान किया।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि श्री पणिक्कर का मानना था कि ज्ञान कभी भी कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं रहना चाहिए, बल्कि मानवता की सेवा करनी चाहिए और सामाजिक जागृति का माध्यम बनना चाहिए। उपराष्ट्रपति ने देश के ज्ञान पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए सरकार की कई पहलों की भी सराहना की। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘मन की बात’ में साझा किए गए दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा कि पुस्तकालयों को ज्ञान के गतिशील केंद्रों के रूप में विकसित होना चाहिए।