भारतीय रिज़र्व बैंक ने साइबर धोखाधड़ी और विवादित लेनदेन पर रोक के संबंध में नई रूपरेखा का मसौदा जारी किया है। इसके अंतर्गत बैंक पूरे अकाउंट के बजाय सिर्फ़ विवादित लेनदेन की राशि पर ही अस्थायी रूप से रोक लगा सकेंगे। ऐसा तभी किया जा सकेगा जब एक हजार रुपये या उससे अधिक के असामान्य अंतरण के म्यूल अकाउंट या साइबर फ्रॉड से जुड़े होने की आशंका हो। बैंकों को अचानक, ग्राहक की बताई गई प्रोफ़ाइल के लिए अनुपयुक्त, या ज्ञात साइबर-फ्रॉड नेटवर्क से जुड़े अंतरण की पहचान करने के लिए एआई-आधारित लेनदेन की निगरानी प्रणाली का इस्तेमाल करना होगा।
मसौदा निर्देश अगले वर्ष पहली अप्रैल से लागू होने वाले हैं, लेकिन बैंक इन्हें पहले भी अपना सकते हैं। यह रूपरेखा सुप्रीम कोर्ट के 4 अगस्त 2026 के आदेश के अनुसार तैयार की गई है। इसके अंतर्गत रिजर्व बैंक को मनी-म्यूल गतिविधि और साइबर धोखाधड़ी से जुड़ी राशि या बैंक खाते पर अस्थायी रोक लगाने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया-एसओपी निर्धारित करने और प्रसारित करने का निर्देश दिया गया था। संदिग्ध मनी-म्यूल अकाउंट के लिए रिजर्व बैंक के प्रस्तावित नियम पूरे अकाउंट पर रोक लगाने के सख़्त तरीके की जगह ज़्यादा लक्षित तरीका अपनाएँगे। इस मसौदे पर जनता के सुझाव और टिप्पणियां मांगी गई हैं। इसमें केवाईसी निर्देंश 2025 के तहत बैंक खाता संचालन और मनी म्यूल पर मौजूदा निर्देंशों में परिवर्तन किया गया है।
प्रस्तावित प्रक्रिया में ग्राहकों को किसी लेनदेन का औचित्य साबित करने के लिए 20 कैलेंडर दिवस का समय मिलेगा। इसके लिए उन्हें पहचान का प्रमाण, उसका संदर्भ या ऐसे दस्तावेज देने होंगे जो यह दिखाते हों कि फंड कहाँ से आया है। इसके बाद बैंकों के पास स्पष्टीकरण और सहायक प्रमाण को देखने के लिए 10 कैलेंडर दिन होंगे। अगर खाताधारक का स्पष्टीकरण ठीक है, तो रोक तुरंत हटानी होगी। यदि ग्राहक 20 दिन में जवाब नहीं देता, या स्पष्टीकरण से साइबर धोखाधड़ी का संदेह दूर नहीं होता है, तो बैंक को एनसीआरपी/सीएफआरएमएस पोर्टल के ज़रिए प्रकरण संबंधित पुलिस को सौंपना होगा। संबंधित राशि को हमेशा के लिए फ्रीज़ नहीं रखा जा सकता। उसके बाद ज़िम्मेदारी कानून प्रवर्तन एजेंसी की होगी। उसे रेफरल से 30 दिन के अंदर औपचारिक वैधानिक आदेश जारी करना होगा।