नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार लाहिड़ी ने कहा कि आयुर्वेद का वैश्विककरण न केवल भारत के पारंपरिक ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए, बल्कि रोजगार सृजन, निर्यात को बढ़ावा देने और स्वदेशी मूल्यों और आकर्षण को सशक्त करने के लिए भी आवश्यक है। आज नई दिल्ली में आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए रणनीतिक रोडमैप पर एक रिपोर्ट जारी करते हुए श्री लाहिड़ी ने इस बात पर बल दिया कि आयुर्वेद की वैश्विक विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक प्रमाणीकरण और साक्ष्य-आधारित अनुसंधान जरूरी है। उनका कहना था कि भविष्य की पीढ़ियां केवल परंपरा पर निर्भर न रहकर वैज्ञानिक प्रमाणों को ही मान्यता देंगी। इसके लिए उन्होंने कठोर परीक्षण और अनुसंधान की आवश्यकता पर बल दिया।
आयुष मंत्रालय के सचिव, वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा कि हाल ही में किए गए एक क्षेत्र-आधारित सर्वेक्षण के अनुसार, भारत का पारंपरिक चिकित्सा क्षेत्र लगभग 61 अरब डॉलर तक बढ़ गया है, और वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा बाजार में देश की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत तक है। श्री कोटेचा ने कहा कि इस क्षेत्र में सेवाओं का 36 अरब डॉलर और विनिर्माण का 25 अरब डॉलर का योगदान है। उन्होंने यह भी कहा कि निरंतर नीतिगत समर्थन और हितधारकों के सहयोग से पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर भारत की अग्रणी स्थिति और मजबूत होगी।