विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा है कि पिछले कई दशकों में सेमीकंडक्टर चिप एक छिपे हुए औद्योगिक घटक से आगे बढ़कर आर्थिक क्षमता, तकनीकी परिपक्वता और राष्ट्रीय क्षमता का मापदंड बन गई है। नई दिल्ली के यशोभूमि में सेमीकॉन इंडिया 2026 के दौरान अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर एक सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि कोई भी देश, चाहे वह कितना ही विकसित क्यों न हो, अकेले चिप का निर्माण नहीं कर सकता। श्री मिसरी ने कहा कि ताइवान दुनिया की करीब 90 प्रतिशत सबसे उन्नत चिप का उत्पादन करता है, लेकिन इसके लिए डिजाइन सॉफ्टवेयर, उपकरण और सामग्री दूसरे देशों से आती हैं।
विदेश सचिव ने कहा कि सेमीकंडक्टर की पूरी मूल्य श्रृंखला अलग-अलग देशों में फैली हुई है। डिजाइन, उपकरण, फैब्रिकेशन, सामग्री और असेंबली के लिए विभिन्न देशों की विशेषज्ञता की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि तकनीकी क्षेत्र में आगे बढ़ने की होड़ अब केवल देशों के बीच प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि कंपनियों के लिए भी एक साझा राष्ट्रीय परियोजना और अवसर बन गई है। उन्होंने कहा कि अमरीका अपने चिप्स अधिनियम के तहत 50 अरब डॉलर से अधिक का निवेश कर रहा है, चीन घरेलू क्षमता बढ़ाने में लगातार निवेश कर रहा है और यूरोप वैश्विक चिप विनिर्माण क्षमता का पांचवां हिस्सा हासिल करने का लक्ष्य रखता है। उन्होंने कहा कि भारत का सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम भी इसी सोच पर आधारित है।
श्री मिसरी ने कहा कि आत्मनिर्भरता का अर्थ यह नहीं है कि हर चीज देश की सीमाओं के भीतर ही बनाई जाए। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई देश नहीं करता और न ही ऐसा करने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि इससे लागत बढ़ेगी, नवाचार की गति धीमी होगी और औद्योगिक आधार सीमित हो जाएगा। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता का अर्थ है यह तय करना कि किन क्षमताओं और उत्पादन क्षेत्रों में देश को संप्रभु क्षमता विकसित करनी है और उन्हें मजबूत करना है, जबकि जिन क्षेत्रों में विश्वसनीय साझेदारी अधिक उपयोगी हो, वहां समान प्रतिबद्धता के साथ सहयोग किया जाए।
उन्होंने कहा कि भारत डिजाइन, पैकेजिंग और उन विशेष विनिर्माण क्षेत्रों में घरेलू क्षमता विकसित कर रहा है, जहां उसकी वास्तविक बढ़त है। साथ ही, दुनिया की प्रमुख उपकरण निर्माता कंपनियों, सामग्री आपूर्तिकर्ताओं और डिजाइन कंपनियों को भारत के साथ मिलकर काम करने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है।