भारत ने भूमि की उर्वरता बहाल करने और सूखे से निपटने की क्षमता को मज़बूत करने के लिए विभिन्न और पर्याप्त संख्या में, अनुमान आधारित तथा लगातार उपलब्ध होने वाली अंतरराष्ट्रीय वित्त योजनाओं की ज़रूरत पर बल दिया है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने मंगोलिया के उलानबटार में, मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन-यू.एन.सी.सी.डी के कॉप-17सत्र के दौरान “उर्वर भूमि और सूखे से निपटने की क्षमता के लिए नए वित्तीय तरीक़े” पर मंत्रिस्तरीय वार्ता को संबोधित करते हुए ये बातें कहीं।
श्री यादव ने कहा कि बड़े पैमाने पर मरुस्थलीकरण, भूमि की उर्वरता नष्ट होने और सूखे की समस्या से निपटने के लिए सरकारी बजट के अलावा वित्त पोषण के अलग-अलग, अनुमान आधारित और लगातार उपलब्ध स्रोतों के साथ-साथ मज़बूत सरकारी और निजी क्षेत्र की भागीदारी की ज़रूरत है।
अलग-अलग स्रोतों को एक साथ लाने के महत्व को रेखांकित करते हुए, श्री यादव ने कहा कि ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम और मुआवज़े के तौर पर पेड़ लगाने जैसे तरीकों के ज़रिए सरकारी और निजी फ़ंडिंग को एक ही इलाके में और नागरिकों की भागीदारी के साथ रखना, सरकार और पूरे समाज के नज़रिए को दर्शाता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि वित्तीय सहायता लगातार पुष्टि करने योग्य और स्थानीय समुदायों से जुड़ी होनी चाहिए। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने अपने अनुभव, सुरक्षा उपायों, संस्थागत व्यवस्थाओं, सीखे गए सबक और उन बातों को साझा करने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया जिनमें सुधार की आवश्यकता है।