‘सरला साहित्य संसद’ ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को कटक में ‘कलिंग रत्न पुरस्कार’ से सम्मानित किया है। इस पुरस्कार में देवी सरस्वती की चांदी की मूर्ति और प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया जाता है। इस अवसर पर न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि मनुष्य जीवन में भले ही कितनी भी दूर क्यों न चला जाए, लेकिन उसकी जन्मभूमि की मिट्टी ही उसकी स्मृति, पहचान और सांस्कृतिक विरासत को आकार देती है।
न्यायमूर्ति मिश्रा ने संविधान की प्रस्तावना में बताए गए ‘बंधुत्व’ को ऐसा जीवंत नैतिक बंधन बताया जो जाति, धर्म, भाषा और सामाजिक स्तर से ऊपर है। उन्होंने कहा कि अन्य व्यक्ति की गरिमा को कम करके किसी की गरिमा की रक्षा नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि अन्य व्यक्ति की मानवता का सम्मान करके ही व्यक्ति अपनी मानवता को भी साबित करता है। युद्ध-विरोधी कवियों का ज़िक्र करते हुए, न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि युद्ध से जीत तो मिल सकती है, लेकिन शांति शायद ही कभी मिलती है; इसके बजाय, युद्ध अपने पीछे दुख, नफ़रत और ज़ख्मी पीढ़ियाँ छोड़ जाता है।
इस अवसर पर प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. रामचंद्र बेहरा को भी ‘सरला सम्मान’ प्रदान किया गया। यह सम्मान ओड़िया साहित्य में छह दशकों से ज़्यादा समय तक उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया गया है। ‘सरला साहित्य संसद’ के संस्थापक और अध्यक्ष प्रभाकर स्वाइन की अध्यक्षता में आयोजित पुरस्कार समारोह में ओडिशा के कानून मंत्री पृथ्वीराज हरिचंदन मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए।